Monday, January 4, 2021

 

         ययाति और देवयानी-शर्मिष्ठा

    शर्मिष्ठा राजा वृषपर्वा की कन्या थी व देवयानी उनके गुरु शुक्राचार्य की पुत्री तथा शर्मिष्ठा की सखी थी। एक दिन जल विहार के बाद भूलवश शर्मिष्ठा ने देवयानी के वस्त्र पहन लेने पर देवयानी क्रोधित हो कर बोली -शर्मिष्ठा तुमने ब्रह्मण पुत्री के वस्त्र पहनने का साहस कैसे किया? ब्राह्मणों में श्रेष्ट हम भृगुवंशी है मेरे वस्त्र धारण करके तूने मेरा पमान किया है देवयानी के अपशब्दों को सुनकर राजकुमारी शर्मिष्ठा तिलमिला गयी और क्रोधित होकर उसे नंगी ही उपवन के एक कुएं में ढकेलवा दिया     

    संयोगवश सोमवंंशी राजा ययाति उस समय वन में शिकार खेलते हुये पानी की खोज में उसी कुएं के पास गए राजा ययाति ने अपने हाथ से उसका हाथ पकड़कर कुएं से बहार निकाल लिया देवयानी ने ययाति से कहा हे वीर! जिस हाथ को तुमने पकड़ा है उसे अब कोइ दूसरा न पकडे। ययाति ने देवयानी से विवाह कर लिया। उधर राजा वृषपर्वा ने शर्मिष्ठा के साथ गुरूजी के पैरो में गिरकर क्षमा याचना किया तब देवयानी बोलीं मै पिता की आज्ञा से जिस पति के घर जाऊं अपनी सहेलियों के साथ आपकी पुत्री शर्मिष्ठा उसके यहाँ पर दासी बनकर रहे शर्मिष्ठा ने अपने पिता के हित में देवयानी की शर्त मान ली और देवयानी की दासी बनकर ययाति के पास आ गयी। कुछ दिनों के बाद देवयानी पुत्रवती हो गई| देवयानी को संतान देख शर्मिष्ठा ने भी संतान प्राप्ति के उद्देश्य से राजा ययाति से एकांत में सहवास की याचना की जिसे धर्म-संगत मानकर राजा ने उसे स्वीकारा और देवयानी से इस सम्बंध को छुपाया इस तरह देवयानी को दो पुत्र और शर्मिष्ठा को तीन पुत्र हुये । जब देवयानी को ज्ञात हुआ कि शर्मिष्ठा ने मेरे पति द्वारा गर्भ धारण किया तो वह क्रुद्ध हो कर अपने पिता शुक्राचार्य के पास चली गयी| जब शुक्राचार्य को सारा वृतांत मालुम हुआ तो क्रोधित होकर वे ययाति से बोले -हे स्त्री-लोलुप! तू मंद बुद्धि और झूठा है| जा मनुष्यों को कुरूप करने वाला बुढ़ापा तेरे शरीर में जाये। तब ययाति बोले हे ब्राह्मण श्रेष्ठ मेरा मन आपकी पुत्री के साथ सहवास करने से अभी तृप्त नहीं हुआ है।इस शाप से आपकी पुत्री का भी अनिष्ट होगा। यह सोचकर शुक्राचार्य बोले जाओ यदि कोई प्रसन्नता से तेरे बुढ़ापे को लेकर अपनी जवानी दे दे तो उससे अपना बुढ़ापा बदल लो। 

    राजा ययाति अपने राज महल वापस और वे अपने पुत्रों से  बोले कि तुम अपनी तरुणावस्था मुझे दे दो तथा मेरा बुढ़ापा स्वीकार कर लो। तब यदु बोले पिताजी असमय आपकी वृद्धावस्था को मै लेना नहीं चाहता क्योकि बिना भोग भोगे मनुष्य की तृष्णा नहीं मिटती है। इसी तरह तुर्वसुदुह्यु और अनु ने भी अपनी जवानी देने से इन्कार कर दिया। तब राजा ययाति के कनिष्ठ पुत्र पुरु ने अपने पिता की इच्छा के अनुसार उनका बुढ़ापा लेकर अपनी जवनी दे दिया। पुत्र से तरुणावस्था पाकर राजा ययाति वर्षों यथावत विषयों का सेवन करने लगे परन्तु भोगो से तृप्त न हो सके राजा ययाति ने जब देखा कि इन भोगो से मेरी आत्मा नष्ट हो गयी है और सोचने समझने की शक्ति क्षीण हो गयी है, तब वे दुखी होकर देवयानी से बोले- हे देवयानी!मैं तुम्हारे प्रेमपाश में बंधकर अपनी आत्मा भूल गया हूँ। विषय-वासना से युक्त पुरुष को पृथ्वी के सभी श्वर्य,धन-धन्य मिलकर भी तृप्त नहीं कर सकते।

भोगा भुक्ता वयमेव भुक्ताः तपो तप्तं वयमेव तप्ताः।
कालो यातो वयमेव याताः तृष्णा जीर्णा वयमेव जीर्णाः

(हे देवयानी!  हमने भोग नहीं भुगते, बल्कि भोगों ने ही हमें भुगता है; हमने तप नहीं किया, बल्कि हम स्वयं ही तप्त हो गये हैं; काल समाप्त नहीं हुआ हम ही समाप्त हो गये; तृष्णा जीर्ण नहीं हुई, पर हम ही जीर्ण हुए हैं !)

न जातु कामः कामानामुपभोगेन शाम्यति ।हविषा कृष्णवर्त्मेव भूय एवभिवर्धते (महाभारत, आदि पर्व 80.84; विष्णु-पुराण 4.10.9-15)

(जैसे अग्नि में घी डालने पर वह बुझती नहीं है। बल्कि ज्यो-ज्यो घी डालते जाओ त्यों त्यों वह भड़कती जाती है| इसी प्रकार भोगों को जितना भोगते जाओ तृष्णा उतनी ही बढ़ती जाती है कम नहीं होती)

    जो मनुष्य अपना कल्याण चाहता है उसे शीघ्र ही भोग-वासना की तृष्णा का त्याग कर देना चाहिए।इस प्रकार महाराज ययाति ने अपनी पत्नी देवयानी को समझाकर पुरु को उसकी जवानी लौटा दिया तथा उससे अपना बुढ़ापा वापस ले लिया| तदोपरांत उन्होंने अपने पुत्र दुह्यु को दक्षिण-पूर्व की दिशा में तथा यदु को दक्षिण दिशा में व तुर्वसु को पश्चिम दिशा में और अनु को उत्तर दिशा में राजा बना दिया। पुरु को राज सिंहासन पर बिठाकर उसके सब बड़े भईयों को उसके अधीन कर स्वयँ वन को चले गए (वायु-पुराण 4.10.1708)

Wednesday, December 30, 2020

 

                        पुरुरवस्-उर्वशी : विश्व की प्रथम प्रेम-कथा

ऋग्वेद में आयी वैदिक संस्कृति की पहली कथा उर्वशी और राजा पुरुरवा की मार्मिक प्रणय-गाथा  है जो  दो भिन्न संस्कृतियों की टकहराट का प्रतीक है। शतपथ ब्राह्मण, भागवत पुराण, पद्म पुराण, महाकवि कालिदास  संस्कृत नाटक महाकाव्य विक्रमोर्वशीय आधुनिक हिंदी साहित्य में रामधारी सिंह दिनकर की काव्यकृति ऊर्वशी का आधार यही प्रसंग है। महाभारत में भी यह वर्णन है कि जब अर्जुन इंद्र के पास अस्त्र विद्या की शिक्षा लेने गए तो उर्वशी उन्हें देखकर मुग्ध हो कामातुर हो गई। अर्जुन ने अपने पूर्वज पुरुरवा की पत्नि व पुरु वंश की जननी के रूप में ऊर्वशी को मातृवत देखा। अतः उसकी इच्छा पूर्ति न करने के कारण इन्हें शापित होकर एक वर्ष तक पुंसत्व से वंचित रहना पड़ा।

 उर्वशी स्वर्गलोक की मुख्य अप्सरा थी जो देव राज इंद्र के दरबार में प्रत्येक सन्ध्या नृत्य किया करती थी। वह कौमार्य, सौन्दर्य, लावण्य, मोहकता और भव्यता के प्रतीक थी। एक बार वह तथा उसकी सखी अन्य अप्सरा, चित्रलेखा दोनों भूलोक पर भ्रमण के लिए गयीं। वहाँ एक असुर की उन पर दृष्टि जा पड़ी और उसने उनका अपहरण कर लिया। वह उन्हें एक रथ में लिये चला जा रहा था और वे जोर-जोर से विलाप कर रही थीं कि गंधमंडल के राजा पुरुरवा ने उनका चीत्कार सुन लिया। पुरुरवा सिंह के समान निर्भीक था। उसने उर्वशी को छुड़ाकर उस असुर को तलवार के घाट उतार दिया। पुरुरवस् द्वारा उर्वशी को छुड़ाते समय हुए किसी नश्वर मनुष्य के उस प्रथम स्पर्श से ही उर्वशी को पुरुरवा से प्रेम हो गया। दिनकर के शब्दों में :

यह विद्धुत्मेय स्पर्श तिमिर है, पाकर जिसे त्वचा की

नींद टूट जाती, रोमों में दीपक बल उठते हैं ’’

वह स्वर्ग लोक लौट गयी परंतु उर्वशी का मन वहां न लग पाया। स्वर्ग में संध्या को एक प्रहसन (नाटक) में लक्ष्मी के रूप में उसने पुरुषोत्तम विष्णु को पुकारने की जगह अनायास वह पुरुरवा को पुकार बैठी। नृत्यनाटिका के रचयिता भरत मुनि ने क्रुद्ध हो तुरन्त उसे शाप दे दिया : ‘‘तुमने मेरी नाटिका में चित्त नहीं रमाया। तुम भूलोक में जाकर वहाँ पुरुरवा के साथ मनुष्य की भाँति ही रहो।’’

अभिसारिका उर्वशी अपने दो मेमनों(मेष) के साथ पुरुरवा के पास गंधमदन चली आयी। उसने पुरुरवा से कहा, ‘‘राजन्, मैं तुम्हारे साथ रहूँगी, तुम्हारी वधु बनूँगी, किन्तु एक शर्त पर कि मैं तुम्हें विवस्त्र कभी न देखूँ।’’ पुरुरवा ने कहा ‘‘तथास्तु! मुझे यह शर्त मंजूर है।’’ उर्वशी के अभिसारिकारूप ने परुरवा को इतना प्रेमासक्त कर दिया कि वह उर्वशीमय बन गया। दिनकर ने लिखा है-

      पर, मैं बाधक नहीं जहां भी रहो, भूमि या नभ में,

       वक्षस्थल पर, इसी भांति, मेरा कपोल रहने दो।

      कसे रहो, बस इसी भांति, उस पीड़क आलिंगन में

      और जलाते रहो अधर-पुट को कठोर चुम्बन में।

ग्रीष्म ऋतु में इस प्रेम का कालिदास ने विक्रमोर्वशीयम में इस प्रकार वर्णन किया है:

अनुपनतमनोरथस्य पूर्व्। शतगुणित गता मम त्रियामा, यदि तु तव समागमे तथैव्। प्रसरति सुभ्रु ततः कृती भवेयम् (3.22)।

(पुरुरवा को ग्रीष्म ऋतु की रात्रि छोटी होने के कारण व्याकुल करती है। वे चाहते हैं जो रात्रि विरहावस्था में सौगुनी बड़ी लगती थी, वह उर्वशी के समागम में विस्तृत हो जाये)

उर्वशी-सखि! रोचते ते मेयं मुक्ताभरणभूषितो नीलांशुक परिग्रहोअभिसारिकावेषः (3.22)

(ग्रीष्म ऋतु में उर्वशी अभूषण-रहित श्रिंगार कर व नीला झीना पतला वस्त्र धारण कर पुरुरवा के पास जाने से पहले अपने इस अभिसारिका-श्रिंगार की अपनी सखि चित्रलेखा से प्रशंसा चाहती है)

एक वर्ष बाद उर्वशी ने पुरुरवा के पुत्र को जन्म दिया। उर्वशी को अपने मेमनों से इतना प्रेम था कि सोते-जागते समय वह उन्हें अपने पलँग से बाँधकर रखा करती थी। एक रात को जब उर्वशी पुरुरवा के साथ निर्वस्त्र प्रणय में लीन थी तब इंद्र ने अपने गन्धर्वों से उसका मेमना चुरवा लिया। उर्वशी चीखी, ‘‘गन्धर्व मेरा मेमना चुराये लिये जा रहे हैं!’’ पुरुरवा तत्काल उठ खड़ा हुआ और उसने गन्धर्वों का पीछा किया। शीघ्रता में उसके रात्रिकालीन वस्त्र शरीर से छूट गये। तभी इंद्र ने बादलों से बिजली चमका दी। उर्वशी ने उसे विवस्त्र देखा और वह पुरुरवा को विरह-विलाप में तड़पता दुखी छोड़  इंद्रलोक चली गयी।पुरुरवा की व्यथा दिनकर के शब्दों में :

 मेरे अश्रु ओस बनकर कल्पद्रमु पर छायेंगे,

 पारिजात-वन के प्रसून आहों से कुम्हलायेंगे

 मेरी मर्म-पुकार मोहिनी वृथा नहीं जायेगी,

आज नहीं तो कल तुझे इन्द्रलोक में वह तड़पायेगी।

      ऋग्वेद में पुरुरवा-उर्वशी संवाद बिना किसी पूर्वपीठिका के अचानक शुरू हो जाती है- उर्वशी को जाते देख विरहोन्मत पुरुरवा कहता है- आह, हे पत्नी, अपना यह हठ छोड़ दो। अरे ओ हृदयहीन, आओ हम प्रेमालाप करें।उर्वशी- तुमसे अब कैसा प्रेमालाप ? उषा की पहली किरण की तरह मैं उस पार जा चुकी हूं। हे पुरुरवस, अपनी नियति में लौट जाओ। मुझे पकड़ना उतना ही कठिन है, जितना पवन के झोंके को पकड़ना (हुये जाये मनसा तिष्ठ घोरे, वचांसि मिश्रा कृणवावहै नु। न नौ मंत्रा अनुदितास, एते मयस्करन् परंतरे चनाहन्। किमेता वाचा कृणवा, तवाहं प्राक्रमिषमुषसामग्रियेव। पुरुरवः पुनरस्तं परेंहि, दुरापना वात इवाहमस्मि 10.95.1)।  लेकिन पुरुरवा पुनः उसे रोकने का प्रयास करता है और अपने प्राण त्याग करने का प्रयत्न करता है तब उर्वशी कहती है, ‘ हे पुरुरवस् । अपने प्राण न लो और स्वयं को इतना न गिराओ कि भूखे भेड़ियों तुम्हे अपना भोग्य बना लें। स्त्रियों के साथ प्रेम नहीं हो सकता, उनके हृदय भेडियों के हृदय की भांति होते हैं (पुरुरवो मा मृथा प्र पप्तो , मा त्वा वृकासो अशिवास उ क्षन्, न वै स्त्रैणानि सख्यानि संति, सालावृकाणां हृदयान्येता 10.95.15) शांत हो कर पुरुरवा कहता है- मैं, पुरुषों में सर्वश्रेष्ठ, वायुमंडल को अपने विस्तार से भर देने वाली, आकाश पार करने वाली उर्वशी के आगे नतमस्तक हूं। सभी सत्कर्मों का पुण्य तुम्हारा हो, पलट जाओ, मेरा हृदय (भय से) उत्तप्त है।यह प्रकरण जिस तरह अचानक शुरू हुआ था, उसी तरह समाप्त हो जाता है, उर्वशी के इस कथन के साथ - ये देवता तुझसे यही कहते हैं, इला के पुत्र; अब तेरी मृत्यु निश्चित है। तेरी संततियां देवताओं को बलि अर्पित करती रहेंगी, लेकिन तू स्वयं स्वर्ग में आनंद करेगा(ऋग्वेद 10.95.18)।

      पुरुरवा पर्वतों व वनों में उर्वशी को अर्ध-विक्षिप्त हो ढूंंढता फिर रहा है। कालिदास ने विक्रमोर्वशीयम में इसका सुंदर विवरण दिया है:

नव जलधर सन्नध्द्योयं न दृष्टनिशाचरः सुरधनुरिदं दूराकृष्टं न नामशरासनम् अयमपि पटुधारासारो न बाण परम्परा। कनकनिकषास्नि ग्धा विद्युत्प्रिया मम नोर्वशी (4.7)।

(पुरुरुवा वर्षा ऋतु में अपने व्याकुल मन से कहते हैं कि ये घुमड़ते काले बादल हैं, निशाचर नहीं; यह इंद्रधनुष है, कानों तक खींचा गया धनुष नहीं; यह मूसलाधार जलवृष्टि है, बाणों की वर्षा नहीं। यह कसौटी पत्थर पर बनी स्वर्ण-रेखा के समान चमचमाती हुई बिजली है मेरी प्रिय उर्वशी नहीं)

आरक्त राजभिरियं कुसुमैर्नव कंदली सलिलगर्भेः। कोपादंतर्वाष्पे स्मरयति मां लोचने तस्याः। (4.15)

(पुरुरवा कहते हैं कि इस कंदली वृक्ष के लाल धारियों वाले नव-पुष्प में भरा हुआ वर्षा-जल मुझे प्रयण-कुम्पित उर्वशी की उन्माद-मत्त डबडबाई आंखों में उभरती लाल धारियां की याद दिला रहे हैं)

महदपि परदुःख शीतलं सम्यगाहुः , प्रणयमगण्यित्वायन्ममापदगतस्य । अधरमिव मदांध पातुमेषा प्रवृत्ता फलमभिमुखपाकं राजजम्बू द्रुमस्य (4.17)

(दूसरों के दुखों को शीतल बताने वाले शायद सही हैं। मेरे प्रणय-विरह के संताप की परवाह न कर यह मतवाली कोयल जामुन के वृक्ष के पके फल को इस प्रकार खाने में लही है जैसे कोई प्रिय जन के अधरों का पान कर रहा हो)    

कथं सेंद्रगोपं नवशाद्वलमिदम् । कुतो न खलु निर्जने वने प्रिया प्रवृत्ति रत्र गमयितव्या । नीलकंठ । ममोत्कंठा वनेअस्मिन् वनिता त्वया। दीर्घापाड़गां सितापाड़गां दृष्टा दृष्टिक्षमा भवेत (4.21)

(वर्षा ऋतु में विकसित हरी घास पर चलती हुई मखमली लाल वर्ण की वीर वधूटियों को देख कर पुरुरवा प्रसन्न होता है, तत्क्षण ही उन्हें इस निर्जन वन में प्रियतमा उर्वशी की याद आ जाती है। हे श्वेत नेत्र-कनीनिकाओं वाले नीलकण्ठ (मयूर)! तुमने मेरी उन्नत कण्ठ वाली, विशाल नेत्रों वाली दर्शनीय उर्वशी को शायद इस वन में देखा हो? )

Monday, December 21, 2020

 

                              महाराणा कुंभा – एक विलक्षण योद्धा

    कीर्तिस्तम्भ में कुम्भा की प्रशंशा में लिखा है: “पृथ्वी को कम्पायमान करते हुए गुर्जर खंड और मालवा के अधिपति सुल्तानों ने अपनी समुद्र जैसी विशाल सेनाओं के साथ मेवाड़ पर आक्रमण किये तो कुम्भकर्ण ने भूमि को जाज्वल्यमान किया। हम उसकी कितनी प्रशंसा करें ! अपने शत्रुओं की सेनाओं के बीच सिंह के समान था अथवा सुनसान अरण्य में ज्योति के समान !” 

      अपने शत्रुओं –दिल्ली, नागौर, मांलवा और गुजरात के सुल्तानों के निरंतर आक्रमणों को विफल कर उनको पराजित कर कुम्भा ने सशक्त मेवाड़ राज्य की नींव डाली व नागौर की सल्तनत को मिटा कर मेवाड़ में मिला लिया। महाराणा कुम्भा की इन निरंतर विजयों के पीछे उसकी नई युद्ध पद्धति थी जिसने राजपूत युद्ध कला को एक नई दिशा दी। कुम्भा ने अपनी पूर्ववर्ती स्थितियों की समीक्षा कर सबसे पहिले दुस्साध्य दुर्गों के निर्माण पर सर्वाधिक ध्यान दिया और वीर विनोद के अनुसार मेवाड़ सीमा पर 32 दुर्ग बनवाये जिनमें पश्चिमी सीमा पर सिरोही के निकट वसंतगढ, मेरों को रोकने के लिये मचान और जाड़ोल के दुर्ग, भीलों से सुरक्षा के लिये पनोरा का दुर्ग, मेवाड़-मारवाड़ सीमा पर कई दुर्ग, दक्षिण में आबू पर अचलगढ व कुम्भलगढ आदि। सम्भवतः उसकी दुर्ग-युद्ध में महारथ के कारण उसका एक विरुद  शैलगुरु भी है। उसके प्रिय वास्तु-कार्य विशारद और विख्यात शिल्प-शास्त्री व कुम्भलगढ दुर्ग के निर्माता मंडन के ग्रंथ “वास्तुमंडनम” के अनुसार “जिस प्रकार गिरिग्रह में स्थित सिंह सभी प्राणियों में बलवान होता है, वह सभी को परागमुख कर सकता है, उसी प्रकार राजा दुर्ग निवासी हो प्रबल शत्रुओं पर विजय प्राप्त कर सकता है। हज़ार हाथियों और लाख घोड़ों के बल की अपेक्षा राजा विजय की सिद्धि अकेले एक दुर्ग से कर सकता है ( सिंहो दपि सर्व सत्वानां बलवान् गिरि गह्वरे ।स्थितं कृत्वा जयत्याषु वैरिवर्ग सुदारुणम्। गजानां तु सहसेण न च लक्षेणवाजिनाम् । यत्कृत्यं साध्यतेराज्ञः दुर्गेण केन सिद्धति। वास्तुमंडनम 3, 4-5। मंडन के दूसरे ग्रंथ राजवल्लभ-वास्तुशास्त्रम् में भे यही लिखा है “सिंहो वैरिपराभवं तिष्ठन गिरौ गह्वरे दुर्गस्थों नृपति प्रभूतकटकं शत्रुं जयते सगरे(राजवल्लभ-वास्तुशास्त्रम् 4.2)।

कुम्भा ने युद्ध में यंत्रादि के नये प्रयोग भी किये जिसके लिये उसे प्रशस्तियों में अभिनव भारताचार्य भी कहा जाता है। सन 1467-68 ई. की रचित शहाब हाकिम के ग्रंथ मासिर-ए-महमूदशाही के अनुसार सन 1456-57 ई. में मेवाड़-मालवा युद्ध में  कुम्भा ने नेफ्था की आग (आतिशे-नफत) और तीर-ए-हवाई का प्रयोग किया (मासिर-ए-महमूदशाही, 57-58)। यह तीर-ए-हवाई या बान था जो कि बारूद के विस्फोट होने के बाद आगे प्रक्षेपित होता था। इस यंत्र में बारूद का प्रयोग होता था जिसको दागने पर यह सैन्य शिविर पर गिर कर उसे भस्म कर डालता था। मंडन ने राजवल्लभ में लिखा है कि नगर की रक्षा के लिये दुर्ग पर नाना युद्धोपयोगी यंत्रो की स्थापना की जाये।नगर में संग्रामयंत्र, वारूणास्त्र, आग्रेयास्त्र नामक यंत्र होने चाहिये। इन यंत्रों की सुरामिष से पूजा करनी चाहिये, जिससे राजा की विजय हो – यंत्रः पुराणामथ रक्षणाय संग्रामवहयम्बुसमीरणाख्याः ।विनिर्मितास्ते जवद नृपाणां भवंति पुज्याः सूरया च मांसे (राजवल्लभ-वास्तुशास्त्रम् 4.21)।

मंडन ने कुम्भा के एक आग्नेयस्त्र वृहद नालिका यंत्र का विवरण देते हुये कहा है कि इसे गाड़ी या पंज्जर से स्थानांतरित किया जाता था व फणिनी, मरकटी, बांधिका, ज्योतिकया, वलणी, पट्ट आदि इसके अंग थे। मंडन ने वास्तुमंडनम के 60 श्लोकों में अग्नियंत्र बनाने की विधि दी है व कोयला, श्वेत शिलाजित, गंधक, गैरिक आदि से बारूद बनाने की विधि समझाई गयी है।यंत्र-विवरण कुम्भा के पुत्र राणा रायमल के काल में सूत्रधार नाथा द्वारा लिखित ग्रंथ वास्तुमंजरी में भी है। कुम्भा से पूर्व के भारतीय ग्रंथों जैसे शुक्रनीतिसार में भी बारूद बनाने व बारूद से संचालित नालिका यंत्रों का विवरण है (गुत्सव ओपर्ट, ओन द वेपन्स, आर्मी ओर्गेनाइज़ेशंस एंड पोलिटिकल मैक्सिम्स आफ द एंशियेंट हिंदूज़, 62-63)।        

कुम्भा की युद्ध–संचालन में निपुणता का संकेत रसिकप्रिया और कीर्तिस्तम्भ प्रशस्ति में उसके विरुद छापागुरु घायगुरुतोडरमल्ल से मिलता है। वह छापामार युद्ध का प्रारम्भकर्ता था व धावा मारने में निपुण था। संगीतराज के पाठ्य-रत्नकोश के अलंकारोत्सवमें दिये वर्णन के अनुसार सन 1458 ई. में गुजरात के सुल्तान क़ुतुबुद्दीन ने जब चित्तौड़ का घेराव किया तो कुम्भा ने अचानक पहाड़ों से निकलकर मुसलमानों पर आक्रमण कर उन्हें हरा दिया जिसे “अज्ञातघातेषुश्केष्व्कस्मात्” शब्द का प्रयोग है। कुम्भा ने कई युद्ध रात्रि-धावों के कारण जीते। तबाक़त-ए-अकबरी के अनुसार जब मांडू के सुल्तान ने चित्तौड़ को घेर लिया तो अचानक 26 अप्रेल 1443 ई. को रात्रि में महाराणा ने क़िले से निकल अपनी सेना के साथ उस पर आक्रमण किया परंतु सुल्तान ने दृढ पूर्वक उसका सामना किया और आक्रमण को विफल कर दिया। दूसरी रात्रि को इसी प्रकार के युद्ध में सुल्तान ने राणा की सेना पर जवाबी आक्रमण कर दिया जिसमें महाराणा को भी चोट आई एवं उसे चित्तौड़ की ओर लौटने को बाध्य होना पड़ा। सुल्तान भी चित्तौड़ विजय को अगले वर्ष पर छोड़कर मांडू वापस आ गया”।

कुम्भा का धावा मारने की प्रवीणता उसके तीव्र अश्वों व रणमल के राठौरों के कारण थी जिसके सहयोग से उसने अपने राजतिलक (1433ई.) के पहले सात वर्षों में ही अपने सभी शत्रुओं पर विजय प्राप्त कर ली थी। रणकपुर के 1439 ई. के शिलालेख के अनुसार “अपने कुल रूपी कानन (वन) के सिंह राणा कुम्भकर्ण ने सारंगपुर, नराणक, अजयमेरु, मांडू, मंडलगढ, बूंदी, खाटू, चाटसू आदि सुदृढ और विषम दुर्गों को लीला-मात्र व क्षणेन-मात्र से विजयी किया और अपने भुजबल से म्लेच्छ महीपाल रूपी सर्पों का गरुड़ के समान दलन किया।प्रबल पराक्रम के साथ ढिल्ली और गुर्जरत्र के राज्यों की भूमि पर आक्रमण करने के कारण वहां के सुल्तानों ने छत्र भेंटकर उसे हिंदू सुरत्राण का विरुद प्रदान किया था”। सन  1440-41 ई में कुम्भा ने रणमल के नेतृत्व में तीव्र अश्वों की सेना भेज डूंगरपुर नगर को विजित किया जिसका उल्लेख कुम्भलगढ प्रशस्ति में है व संगीतराज प्रशस्ति में जिसके लिये गिरिपुरडूंगरग्रहणसार्थकीकृतोग्राग्रहेण शब्द अंकित है।        

      अपने प्रबल शत्रुओं पर विजय प्राप्त कर व पृथ्वी पर म्लेच्छों द्वारा व्याप्त दुर्व्यवस्था दूर कर वैदिक व्यवस्था के पुनर्संस्थापक कुम्भा ने वसुंधरोद्धरणादिवराहेण की उपाधि धारण की और मांडू के सुल्तान पर विजय की स्मृति में विष्णु अवतार जनार्दन (आदि वारह) को समर्पित कीर्ति-स्तम्भ चित्तौड़गढ में निर्मित किया जिसके लिये अमरकाव्य कहता है “कीर्तिस्तम्भ के बहाने पृथ्वी हाथ उठा कर कह रही है कि चित्रकूट के समान दुर्ग और कुम्भा के समान नरेश नहीं है”।